Thursday, April 1, 2010

आबिद सुरती और आर .के.पालीवाल की अंतरंग वार्ता - 1



आबिद सुरती और आर .के.पालीवाल की अंतरंग वार्ता



आपने साहित्य और कला की विभिन्न विधाओं मे सृजनशील रहते हुए दोनो क्षेत्रों में अच्छी खासी सक्रियता बरकरार रखी है और इन दोनों क्षेत्रों में प्रसिध्दी भी पाई है । हालाँकि इस तरह के प्रयास रामकुमार वर्मा सरीखे गिने चुने कुछ और भी साहित्यकारों,कलाकारों ने किये हैं लेकिन उनमें अधिकांश ने बाद के वर्षो में साहित्य या कला में से एक को ही अधिक तरजीह दी है। आप तकरीबन पांच दशकों से दोनों क्षेत्रों में अपनी सक्रियता कैसे बरकरार रख पाये ?



मैं कुछ बातें सबसे पहले स्पष्ट करना चाहूँगा। भले ही मैं पिछले पचास पचपन साल से साहित्य और कला दोनों से बराबर ओर लगातार जुड़ा रहा हूँ लेकिन मेरी इस दोहरी सृजनशीलता में अलग अलग फेज रहे हैं। पहली बात तो यह कि मैं खुद को मूलत: कलाकार मानता हूँ। पेंटिंग मेरा मनमाफिक विषय है । साहित्य का प्रवेश मेरे जीवन में दूसरी तरह से हुआ। साहित्य की शुरुआत का प्रमुख कारण आर्थिक था। यह अलग बात है कि साहित्य कि सम्भावनायें भी मेरे अन्दर थी ओर इसीलिए अपना परिवार चलाने के लिये पत्रिकाओं ओर प्रकाशकों की फरमाईश के हिसाब से साहित्य सृजित कर पाया। फिर धीरे धीरे मुझे यह भी आभास होने लगा कि फरमाइसी लोकप्रिय साहित्य के साथ साथ मैं गम्भीर साहित्य भी रच सकता हूं। दरअसल मेरे कई साहित्यिक मित्र जब तब इस दिशा मे मोडने के लिये लानत मलामत के जरिये प्रेरित भी करते रहते थे।



जिन दो हिन्दी पत्रिकाओं से मेरा सर्वाधिक जुडाव रहा उनके संपादकों धर्मवीर भारती (धर्मयुग) ओर कमलेश्वर (सारिका) से मेरे करीबी संबंध रहे। धर्मयुग से मेरा जुडाव नियमित कार्टून कलाकर के रूप में था जिसकी ढब्बू जी कार्टून सीरीज ने हिन्दी जगत में अदभुत लोकप्रियता हासिल की थी। सारिका में कुछ चर्चित कहानिओं के जरिये मैं कहानीकार के रूप में रूबरू हुआ।



प्रारंभिक दौर में साहित्य और कला को लेकर मेरा नजरिया कला के प्रति आत्मीय समर्पण वाला था । उन दिनों अपनी चित्रकारी को मूर्त रूप देने के लिए मेरे पास आर्थिक संसाधनों का अभाव था। और यह मुझे गवारा नहीं था कि अपने समकालीन कुछ अन्य कलाकारों की तरह मैं अपनी पेंटिंग्स को पैसे कमाने का जरिया बनाऊँ। इस काम के लिये मैने व्यवसायिक लेखन का सहारा लिया। पहले मैं केवल गुजराती मे लिखता था जिसका बाद मे हिन्दी मे अनुवाद होता था। इस दौर में मैंने कई उपन्यास लिखे जिनका साहित्य की दृष्टी से कोई खास महत्व नहीं है लेकिन उनमें से कई लोकप्रिय हुए ओर मेरी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन बने।



साहित्य का मेरा दूसरा दौर आप उसे मान सकते हैं जब मैने मूल रूप से हिन्दी मे लिखना शुरू किया । धीरे धीरे गुजराती का लेखन कम होता गया और हिन्दी का बढ्ता गया।



साहित्य का मेरा तीसरा दौर पिछले दस वर्षों से चल रहा है। यही वह दौर है जब मैं पूरे मनोयोग से गंभीर साहित्य को समर्पित हूँ। आजकल मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं है और ऐसी आर्थिक आवश्यकतायें नही हैं कि अर्थोपार्जन के लिये मुझे व्यवसायिक लेखन करना पड़े। यह दौर ही मेरे साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण दौर है जिसमें मैंने जितना साहित्य रचा है वह सब एक गंभीर साहित्यकार की संजीदगी के साथ लिखा है। शायद जीवन के इसी पडाव पर पहुँचकर मैं साहित्य ओर कला को समान नजरिये से आत्मसात कर पाया हूँ।



• गुजराती में कई साल लिखने के बाद हिन्दी में लिखने के लिये कौन से कारण प्रमुख थे ?



देखिये, गुजराती मेरी मूलभाषा जरूर है लेकिन मुंबई में रहते हुए हिन्दी , उर्दू, ओर अंग्रेजी से मेरा लगातार सम्पर्क रहा। जहाँ तक हिन्दी का प्रश्न है उसमें मेरी रूचि सबसे पहले देवकी नंदन खत्री की रचनाओं के कारण हुई। उन्हें तो कुछ आलोचक साहित्यकार भी नहीं मानते लेकिन मेरी सच्चाई यही है। हिन्दी ठीक से सीखने के बाद तो हिन्दी के और भी कई रचनाकारों को पढ़ा। धीरे धीरे हिन्दी में भी हाथ साफ होने लगा। उर्दू तो पारिवारिक परिवेश में भी काफी थी। धर्मयुग में धर्मवीर भारती के साथ हिन्दी के कई लेखकों से मिलने जुलने के सिलसिले चल निकले।और हिन्दी में लेखन शुरू हो गया।





हिन्दी में मौलिक लेखन का दूसरा कारण यह भी था कि हिन्दी का पाठक वर्ग गुजराती की तुलना में काफी व्यापक है। कई प्रदेशों में हिन्दी का बोलबाला है। मेरी कई गुजराती रचनाओं के हिन्दी अनुवाद भी काफी लोकप्रिय हुए। हिन्दी पत्रिकाओं के संपादकों और हिन्दी के प्रकाशकों की फरमाईश भी हिन्दी में लिखने का एक कारण बनी।





• कई कहानी संग्रह ओर उपन्यासों के अलावा आपका एक गजल संग्रह भी प्रकाशित हुआ है लेकिन आपने गजलें ओर कविताएँ ज्यादा नहीं लिखी। हिन्दी पाठक आपके कथाकार रूप से ही अधिक परिचित हैं।





साहित्य में मैं कथाकार ही हूं। कविता या गजल मेरी विधा नहीं । एक गजल संग्रह जरूर प्रकाशित हुआ है। बहुत पुरानी बात हो गयी यह भी। दर असल सच्चाई यह है कि इस संग्रह की गजलें मैंने उस समय लिखी थी जब मेरा मन साहित्य और कला दोनों से उचटा हुआ था। उन दिनों कुछ ऐसी मनस्तिथी थी कि न कोई नई कहानी या उपन्यास लिखने का मन था ओर न पेंटिंग बनाने में रूचि थी। एक तरह से टाईमपास जैसा कह सकते हैं इसे। कुछ लोगों ने ये गजलें पढ़कर थोड़ी बहुत तारीफ कर दी। उसी का परिणाम ये हुआ कि यह संग्रह छप गया। इस इकलोते संग्रह के बाद कभी गजल या कविता नहीं लिखी। केवल कहानी और उपन्यास ही लिखे। कविता मेरी विधा नहीं है।










9 comments:

  1. Ye aalekh padhneka apna alag aanand tha..mai abhibhoot hun!
    Mere blogpe ek snehil nimantran!

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  2. dhanyavaad.sheeghr hee is vaartaa ke agale ank blog par aayenge.

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  3. Abid sahab ki bat samajh men nahin aayi. ve kahate hain ki sahitya men main kathakar hi hun, kavita ya gazal meri vidha nahin. phir kahte hain ki jab sahitya aur kala se mera man uchta hua tha, tab maine gazalen likhin. uske aage ve badi vichitr bat kahte hain, gazal likhna timepass jaisa tha. Ek kalakar ka jab apni sadhi hui vidha se man uchat jay to samajhna chahiye ki vah kisi khas bauddhik sankat se gujar raha hai. aise sankat men agar gazal sath de rahi thi to nishchit taur par vah unke dil aur dimag ke jyada karib thi, vah sirf timepass nahin ho sakti hai. aur agar ve timepass men aisi gazalen kah sakte hain, jinki log prashansha karne lagen to main samajhta hun ki yah vidha unko kahani se jyada behtar tarike se vyakt hone ka avsar de sakti thi. shayad unhone apne liye vidha ki pahchan men kahin kuchh galati ki.
    Subhash Rai, Agra

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  4. punasch
    paliwal sahab ko namaskar. idhar shiv shanker ki bhang-tarang ke anand mila ya nahin. yun hi ghumane men aap se mulakat ho gayi. ek blog maine bhi shuru kiya ha. phursat mile to dekhiyega. pata hai......www.bat-bebat.blogspot.com

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  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  6. priya bhai subhash ji evam ajai jee.aapke blog aaj hee dekhe aur padhe.aage bhee padhta rahungaa.

    Blog sahee maayane me aisaa manch hai jo srajansheelta ko bina rok tok aur sampadakiya hastakchep ke pathako tak pahunchata hai.

    misr jee ko bhee bhang kee lat chudvakar blog kee behtar lat padni chahiye.

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  7. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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  8. चिट्ठाजगत में आप का स्वागत है। सार्थक और सफल लेखन के लिए शुभकामनाएं...

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  9. प्रिय भाई जयराम जी और अजय जी। आपकी सकारात्मक टिप्पणी के लिये ्बहुत बहुत धन्यवाद ।

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